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यह पुस्तक कर्म की गुत्थियों को सुलझाती है और जीवन की
उलझन भरी राहों पर आगे बढ़ने के सूत्र बताती है।
बोलचाल में 'कर्म' शब्द का अक्सर प्रयोग किया जाता है। इसके बारे में कई भ्रान्तियाँ भी फैली हैं। लोग इसे एक बही-खाते की तरह समझते हैं, जिसमें हमारे अच्छे बुरे कार्यों और विचारों का हिसाब रखा जाता है; एक ऐसी व्यवस्था जो यह तय करती है कि अच्छे के साथ अच्छा हो और बुरे के साथ बुरा। आखिर सच क्या है?
इस पुस्तक में सद्गुरु न सिर्फ कर्म से जुड़ी भ्रान्तियों को दूर करते हैं, बल्कि वे कर्म की बारीकियों को समझाकर, कर्म की सम्भावनाओं पर प्रकाश डालते हुए, हमें जीवन की बागडोर अपने हाथ में लेकर उसे पूरी गहराई से जीने के लिए प्रेरित करते हैं।
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